Bhagwat Geeta भारतीय दर्शन का वह ग्रंथ है जो केवल धार्मिक पाठ तक सीमित नहीं रहता, बल्कि जीवन, कर्म, निर्णय और मानसिक संतुलन से जुड़े प्रश्नों का व्यावहारिक उत्तर देता है। महाभारत के युद्धभूमि में दिया गया यह उपदेश आज भी उतना ही प्रासंगिक है, जितना उस समय था। इस लेख में bhagwat geeta summary in hindi को अध्याय-वार, सरल और स्पष्ट भाषा में प्रस्तुत किया गया है, ताकि पाठ का मर्म समझने में किसी अतिरिक्त संदर्भ की आवश्यकता न रहे।
भगवद गीता का स्वरूप और आधार
गीता में कुल 18 अध्याय और 700 श्लोक हैं। इसका संवाद श्रीकृष्ण और अर्जुन के बीच है, जहाँ अर्जुन का युद्ध से मोह और श्रीकृष्ण का तर्कपूर्ण मार्गदर्शन जीवन के शाश्वत सिद्धांतों को उजागर करता है।
यह ग्रंथ कर्मयोग, ज्ञानयोग और भक्तियोग—तीनों का संतुलित समन्वय प्रस्तुत करता है।

अध्याय 1: अर्जुन विषाद योग
पहले अध्याय में अर्जुन युद्धभूमि में अपने ही संबंधियों को देखकर विचलित हो जाता है।
मुख्य भाव:
- करुणा और मोह का टकराव
- नैतिक दुविधा
- कर्तव्य से पलायन की मानसिक अवस्था
यह अध्याय मानव मन की वास्तविक कमजोरी को दर्शाता है, जहाँ भावनाएँ निर्णय को प्रभावित करती हैं।
इस अध्याय में युद्धभूमि में खड़े अर्जुन का मानसिक संघर्ष सामने आता है। वे अपने ही संबंधियों, गुरुओं और मित्रों को युद्ध के लिए तैयार देखकर अत्यंत व्याकुल हो जाते हैं। अर्जुन को लगता है कि इस युद्ध में विजय भी पाप के समान होगी। उनके हाथ काँपने लगते हैं, धनुष गिर जाता है और मन मोह से भर जाता है। वे तर्क देते हैं कि कुल का नाश होने से समाज और धर्म दोनों नष्ट हो जाएँगे। यह अध्याय मानव मन की उस अवस्था को दर्शाता है जहाँ भावनाएँ कर्तव्य पर हावी हो जाती हैं। यहीं से गीता का उपदेश आरंभ होता है।
ज्ञान:
जब जीवन में निर्णय सबसे ज़रूरी होता है, तब भावनाएँ सबसे बड़ा भ्रम पैदा करती हैं।
अर्जुन का विषाद सिखाता है कि सही और गलत की पहचान अक्सर अपने ही लोगों के कारण धुंधली हो जाती है।
करुणा यदि विवेक से अलग हो जाए, तो वह कर्तव्य से भागने का बहाना बन जाती है।
गीता कहती है—दुख महसूस होना कमजोरी नहीं, लेकिन उसी में अटक जाना पतन है।
पहला अध्याय यह दिखाता है कि ज्ञान की शुरुआत स्वीकार से होती है, न कि उत्तर से।
अध्याय 2: सांख्य योग
यह अध्याय गीता का आधार स्तंभ माना जाता है।
मुख्य विचार:
- आत्मा अमर है
- शरीर नश्वर है
- निष्काम कर्म का सिद्धांत
श्रीकृष्ण अर्जुन को आत्मा और शरीर का अंतर समझाते हैं। वे बताते हैं कि आत्मा न जन्म लेती है, न मरती है, वह शाश्वत है। शरीर का नाश अवश्यंभावी है, इसलिए उसके लिए शोक करना अज्ञान है। श्रीकृष्ण निष्काम कर्म का सिद्धांत रखते हैं—कर्म करो, फल की चिंता मत करो। वे समत्व बुद्धि, स्थिर प्रज्ञा और मानसिक संतुलन का महत्व बताते हैं। यह अध्याय गीता का सार माना जाता है क्योंकि इसमें कर्म, ज्ञान और वैराग्य की नींव रखी गई है।
ज्ञान:
तू शरीर नहीं है, तू आत्मा है—यही गीता का केंद्रीय सत्य है।
जो बदलता है, वह सत्य नहीं हो सकता।
मृत्यु शरीर की है, अस्तित्व की नहीं।
कर्म करना तेरा अधिकार है, फल माँगना नहीं।
समत्व ही बुद्धि है—न जीत में अहंकार, न हार में विषाद।
जो स्थिर है वही मुक्त है, बाकी सब परिस्थिति के गुलाम हैं।
अध्याय 3: कर्म योग
श्रीकृष्ण बताते हैं कि कर्म से बचा नहीं जा सकता।
मुख्य संदेश:
- कर्तव्य का पालन अनिवार्य
- फल की आसक्ति त्यागनी चाहिए
- समाजिक उत्तरदायित्व का महत्व
यह अध्याय आधुनिक कार्यसंस्कृति में विशेष रूप से प्रासंगिक है।
इस अध्याय में श्रीकृष्ण स्पष्ट करते हैं कि कर्म से कोई बच नहीं सकता। यहाँ तक कि शरीर का पालन भी कर्म से ही होता है। वे कहते हैं कि कर्म त्याग नहीं, बल्कि कर्म में आसक्ति का त्याग आवश्यक है। प्रत्येक व्यक्ति को अपने कर्तव्य का पालन समाज और लोककल्याण के लिए करना चाहिए। यज्ञ, सेवा और परिश्रम को जीवन का अंग बताया गया है। यह अध्याय सक्रिय जीवन जीने और जिम्मेदारी से कार्य करने की शिक्षा देता है।
ज्ञान:
कर्म से कोई बच नहीं सकता—न संन्यासी, न ज्ञानी।
अकर्म का अर्थ कर्म छोड़ना नहीं, बल्कि अहंकार छोड़कर कर्म करना है।
कर्तव्य से भागना आध्यात्मिकता नहीं, भय है।
समाज के लिए किया गया कर्म आत्मा को शुद्ध करता है।
जो केवल अपने लिए जीता है, वह बंधन में है।
जो लोक के लिए करता है, वही मुक्त है।
अध्याय 4: ज्ञान कर्म संन्यास योग
यहाँ ज्ञान और कर्म का संतुलन समझाया गया है।
मुख्य बिंदु:
- अवतार का सिद्धांत
- यज्ञ रूपी कर्म
- विवेकपूर्ण आचरण
श्रीकृष्ण अर्जुन को बताते हैं कि यह ज्ञान उन्होंने सूर्य से लेकर मानव तक परंपरा में दिया है। वे अवतार के सिद्धांत को स्पष्ट करते हैं—धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि होने पर वे अवतार लेते हैं। इस अध्याय में कर्म को यज्ञ के रूप में देखने की दृष्टि दी गई है। ज्ञानयुक्त कर्म मनुष्य को बंधन से मुक्त करता है। अज्ञान कर्म को बांधता है, जबकि ज्ञान कर्म को मुक्त करता है।
ज्ञान:
ज्ञान कर्म को जलाता नहीं, शुद्ध करता है।
अज्ञान से किया गया कर्म बंधन बनता है।
ज्ञान से किया गया कर्म यज्ञ बन जाता है।
अवतार का अर्थ चमत्कार नहीं, बल्कि धर्म की पुनः स्थापना है।
जो समझकर कर्म करता है, वह कर्म में रहते हुए भी कर्म से परे होता है।
अध्याय 5: कर्म संन्यास योग
संन्यास और कर्मयोग में भेद स्पष्ट किया गया है।
मुख्य शिक्षा:
- बाह्य त्याग नहीं, आंतरिक वैराग्य आवश्यक
- कर्म करते हुए भी मुक्त रहा जा सकता है
यह अध्याय कर्मयोग और संन्यास के बीच के भ्रम को दूर करता है। श्रीकृष्ण कहते हैं कि बाहरी संन्यास से अधिक महत्वपूर्ण आंतरिक वैराग्य है। जो व्यक्ति फल की इच्छा छोड़े बिना कर्म करता है, वही सच्चा योगी है। ऐसा व्यक्ति संसार में रहते हुए भी मुक्त रह सकता है। सुख-दुःख, मान-अपमान में समभाव रखने वाला मनुष्य शांति प्राप्त करता है। यह अध्याय संतुलित और व्यावहारिक जीवन दृष्टि प्रस्तुत करता है।
ज्ञान:
संन्यास कपड़ों में नहीं, दृष्टि में होता है।
कर्म करते हुए फल छोड़ देना ही वास्तविक त्याग है।
बाहर से शांत और भीतर से अशांत व्यक्ति मुक्त नहीं है।
जो सुख-दुख में समान रहता है, वही योगी है।
गीता सिखाती है—भागने से मुक्ति नहीं, सही तरीके से जीने से मुक्ति है।
अध्याय 6: ध्यान योग
मन पर नियंत्रण इस अध्याय का केंद्र है।
मुख्य विषय:
- ध्यान की विधि
- मन की चंचलता
- आत्मसंयम का अभ्यास
यह अध्याय मानसिक स्वास्थ्य और आत्मनियंत्रण पर गहरा प्रभाव डालता है।
इस अध्याय में ध्यान और आत्मसंयम की विधि बताई गई है। श्रीकृष्ण कहते हैं कि मन चंचल है, लेकिन अभ्यास और वैराग्य से उसे वश में किया जा सकता है। योगी को एकांत, शुद्ध आहार और संयमित जीवन अपनाना चाहिए। ध्यान के माध्यम से आत्मा का साक्षात्कार संभव है। यह अध्याय मानसिक स्वास्थ्य, एकाग्रता और आंतरिक शांति पर गहरा प्रकाश डालता है। आधुनिक जीवन में यह अध्याय विशेष रूप से उपयोगी है।
ज्ञान:
मन ही मित्र है, मन ही शत्रु।
जिसने मन को जीत लिया, उसने संसार को जीत लिया।
ध्यान कोई पलायन नहीं, बल्कि स्पष्टता है।
अभ्यास और वैराग्य—दोनों के बिना मन वश में नहीं आता।
शांत मन में ही सत्य दिखाई देता है।
अशांत मन में ईश्वर भी भ्रम बन जाता है।

अध्याय 7: ज्ञान विज्ञान योग
श्रीकृष्ण अपने वास्तविक स्वरूप का परिचय देते हैं।
मुख्य तत्व:
- भौतिक और आध्यात्मिक प्रकृति
- ईश्वर सर्वव्यापक है
श्रीकृष्ण अपने दिव्य स्वरूप और प्रकृति के रहस्य को प्रकट करते हैं। वे बताते हैं कि भौतिक प्रकृति और जीवात्मा दोनों उनकी शक्ति हैं। संसार में जो भी शक्ति, सौंदर्य या सामर्थ्य है, वह उसी से उत्पन्न है। बहुत कम लोग वास्तविक ज्ञान से ईश्वर को जान पाते हैं। यह अध्याय ईश्वर की सर्वव्यापकता और आध्यात्मिक विवेक को समझने में सहायक है।
ज्ञान:
ईश्वर कहीं बाहर नहीं, हर शक्ति में उपस्थित है।
जो दिखाई देता है, वह प्रकृति है।
जो जानने वाला है, वही परम सत्य है।
बहुत लोग पूजा करते हैं, कम लोग समझते हैं।
ज्ञान बिना अनुभव अधूरा है।
अनुभव बिना विवेक खतरनाक है।
अध्याय 8: अक्षर ब्रह्म योग
मृत्यु और मोक्ष का विवेचन।
मुख्य बिंदु:
- अंतिम समय का स्मरण
- ब्रह्म की प्राप्ति
- कर्मों का प्रभाव
यह अध्याय मृत्यु, मोक्ष और अंतिम समय की चेतना पर केंद्रित है। श्रीकृष्ण बताते हैं कि मृत्यु के समय जो भाव मन में होता है, वही आगे की गति तय करता है। निरंतर ईश्वर स्मरण से मोक्ष की प्राप्ति होती है। ब्रह्म, आत्मा और कर्म के संबंध को सरल रूप में समझाया गया है। यह अध्याय जीवन की नश्वरता और सही दिशा में चिंतन का महत्व सिखाता है।
ज्ञान:
जैसा जीवन, वैसी मृत्यु।
मृत्यु के समय जो स्मरण में है, वही अगली दिशा तय करता है।
जो जीवन भर भोग में डूबा रहा, वह अंत में सत्य नहीं पकड़ सकता।
निरंतर चेतना ही मोक्ष का द्वार है।
मोक्ष कहीं जाने का नाम नहीं, बंधन टूटने का नाम है।
अध्याय 9: राजविद्या राजगुह्य योग
भक्ति का गूढ़ स्वरूप।
मुख्य बातें:
- सरल भक्ति का महत्व
- ईश्वर की कृपा
- आडंबरहीन उपासना
श्रीकृष्ण इस अध्याय में भक्ति को सर्वोच्च बताते हैं। वे कहते हैं कि ईश्वर तक पहुँचने के लिए आडंबर नहीं, सच्ची श्रद्धा आवश्यक है। साधारण कर्म भी यदि भक्ति भाव से किए जाएँ तो पवित्र हो जाते हैं। यह अध्याय ईश्वर की करुणा, सर्वसमावेशी दृष्टि और सरल उपासना पर बल देता है। यह भक्ति को आम जीवन से जोड़ता है।
ज्ञान:
ईश्वर को पाने के लिए कठिन साधना नहीं, सच्ची भावना चाहिए।
भक्ति का अर्थ डर नहीं, भरोसा है।
कर्म छोटा नहीं होता, भावना तय करती है उसका मूल्य।
अहंकार रहित समर्पण ही वास्तविक पूजा है।
ईश्वर सबको स्वीकार करता है—पर शर्त है सत्य।
अध्याय 10: विभूति योग
श्रीकृष्ण अपनी दिव्य विभूतियों का वर्णन करते हैं।
मुख्य संदेश:
- ईश्वर हर श्रेष्ठता में विद्यमान
- सृष्टि में दिव्यता का दर्शन
इस अध्याय में श्रीकृष्ण अपनी दिव्य विभूतियों का वर्णन करते हैं। वे बताते हैं कि संसार की हर श्रेष्ठ वस्तु में वही विद्यमान हैं। पर्वतों में हिमालय, नदियों में गंगा, मनुष्यों में बुद्धि—सब उनकी ही अभिव्यक्ति है। इसका उद्देश्य यह दिखाना है कि ईश्वर को अलग खोजने की आवश्यकता नहीं। यह अध्याय दृष्टिकोण बदलने और संसार में दिव्यता देखने की प्रेरणा देता है।
ज्ञान:
जो श्रेष्ठ है, उसमें ईश्वर की झलक है।
ईश्वर को अलग मत ढूँढ—जीवन में पहचान।
सौंदर्य, बुद्धि, साहस—सब उसी की अभिव्यक्ति हैं।
यह अध्याय सिखाता है कि संसार को देखने की दृष्टि बदलो,
तो वही संसार साधना बन जाता है।

अध्याय 11: विश्वरूप दर्शन योग
यह अध्याय गीता का सबसे दृश्यात्मक और प्रभावशाली भाग है।
मुख्य अनुभव:
- विराट रूप का दर्शन
- समय और विनाश की सच्चाई
- अहंकार का विसर्जन
यह अध्याय गीता का सबसे विराट और प्रभावशाली भाग है। अर्जुन श्रीकृष्ण का विश्वरूप देखते हैं जिसमें संपूर्ण सृष्टि समाहित है। समय, सृजन और विनाश एक साथ दिखाई देते हैं। अर्जुन भय और श्रद्धा से भर जाते हैं। यह अध्याय अहंकार के विसर्जन और ब्रह्मांडीय सत्य के साक्षात्कार को दर्शाता है।
ज्ञान:
संसार जैसा दिखता है, वैसा है नहीं।
सृजन और विनाश एक ही सत्य के दो चेहरे हैं।
अहंकार टूटे बिना सत्य दिखाई नहीं देता।
यह अध्याय सिखाता है—तू कर्ता नहीं, साधन है।
समय सबसे बड़ा सत्य है।
अध्याय 12: भक्ति योग
भक्ति को सर्वोत्तम मार्ग बताया गया है।
मुख्य लक्षण:
- अहंकार रहित आस्था
- समभाव
- करुणा और क्षमा
श्रीकृष्ण यहाँ भक्ति के गुण बताते हैं। सच्चा भक्त द्वेष रहित, करुणामय और समभाव वाला होता है। वह न किसी से अपेक्षा करता है, न किसी से वैर रखता है। यह अध्याय बताता है कि भक्ति कोई कर्मकांड नहीं, बल्कि जीवन शैली है। सरल, शांत और नैतिक जीवन की झलक यहाँ मिलती है।
ज्ञान:
जो द्वेष नहीं करता, वही भक्त है।
जो अपेक्षा नहीं करता, वही मुक्त है।
भक्ति भाव है, प्रदर्शन नहीं।
जो सबमें समान देखता है, वही ईश्वर के निकट है।
सच्चा भक्त शांत होता है, शोर नहीं करता।
अध्याय 13: क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ विभाग योग
शरीर और आत्मा का भेद।
मुख्य विचार:
- क्षेत्र: शरीर
- क्षेत्रज्ञ: आत्मा
- विवेक का विकास
इस अध्याय में शरीर को ‘क्षेत्र’ और आत्मा को ‘क्षेत्रज्ञ’ कहा गया है। श्रीकृष्ण ज्ञान के लक्षण और अज्ञान के परिणाम समझाते हैं। विवेक से आत्मा और शरीर का भेद जानना ही सच्चा ज्ञान है। यह अध्याय आत्मबोध और दर्शन की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है।
ज्ञान:
शरीर खेत है, आत्मा किसान।
जो खेत को ही खुद समझ बैठा, वह अज्ञान में है।
ज्ञान का अर्थ जानकारी नहीं, भेद की समझ है।
जो देखने वाले को जान ले, वही मुक्त होता है।
अध्याय 14: गुणत्रय विभाग योग
तीन गुणों का विश्लेषण:
- सत्त्व
- रज
- तम
यह अध्याय सत्त्व, रज और तम—तीन गुणों की व्याख्या करता है। सत्त्व ज्ञान और शांति देता है, रज कर्म और इच्छा बढ़ाता है, तम अज्ञान और आलस्य लाता है। मनुष्य का स्वभाव इन्हीं गुणों से बनता है। गुणों से ऊपर उठना ही मोक्ष का मार्ग है। यह अध्याय मनोवैज्ञानिक दृष्टि से भी अत्यंत उपयोगी है।
ज्ञान:
सत्त्व शांति देता है,
रज बेचैनी देता है,
तम अज्ञान देता है।
पर मुक्ति तीनों से ऊपर उठने में है।
गुण तुम्हें बाँधते हैं, तुम गुण नहीं हो।

अध्याय 15: पुरुषोत्तम योग
उल्टे अश्वत्थ वृक्ष का रूपक।
मुख्य भाव:
- संसार की अस्थिरता
- परम पुरुष की पहचान
संसार को उल्टे अश्वत्थ वृक्ष के रूप में बताया गया है, जिसकी जड़ ऊपर और शाखाएँ नीचे हैं। यह संसार की अस्थिरता का प्रतीक है। श्रीकृष्ण पुरुषोत्तम तत्व को सर्वोच्च सत्य बताते हैं। यह अध्याय वैराग्य और विवेक के माध्यम से परम सत्य तक पहुँचने की शिक्षा देता है।
ज्ञान:
संसार उल्टा वृक्ष है—जो स्थिर लगता है, वह नश्वर है।
जड़ ऊपर है, सत्य ऊपर है।
जो इस संसार को अंतिम मान लेता है, वह भ्रम में है।
जो परम सत्य को जान लेता है, वही पुरुषोत्तम को पाता है।
अध्याय 16: दैवासुर संपद विभाग योग
मानवीय गुणों का वर्गीकरण।
दैवी गुण:
- अहिंसा, सत्य, करुणा
आसुरी गुण:
- अहंकार, क्रोध, लोभ
यह अध्याय दैवी और आसुरी गुणों का स्पष्ट विभाजन करता है। दैवी गुण मनुष्य को उन्नति की ओर ले जाते हैं, जबकि आसुरी गुण पतन की ओर। अहिंसा, सत्य और संयम दैवी हैं; अहंकार, क्रोध और लोभ आसुरी। यह अध्याय नैतिक जीवन की स्पष्ट रूपरेखा देता है।
ज्ञान:
दैवी गुण उठाते हैं, आसुरी गिराते हैं।
अहंकार सबसे बड़ा अज्ञान है।
क्रोध विवेक का शत्रु है।
जो संयम रखता है, वही शक्तिशाली है।
नैतिकता आध्यात्मिकता की नींव है।
अध्याय 17: श्रद्धात्रय विभाग योग
श्रद्धा के प्रकार:
- सात्त्विक
- राजस
- तामस
यह अध्याय आचरण और विश्वास की गुणवत्ता पर प्रकाश डालता है।
यहाँ श्रद्धा को तीन प्रकार में बाँटा गया है—सात्त्विक, राजस और तामस। व्यक्ति की श्रद्धा उसके आहार, कर्म और विचारों में दिखाई देती है। यह अध्याय बताता है कि केवल कर्म ही नहीं, कर्म के पीछे की भावना भी महत्वपूर्ण है। जीवन की गुणवत्ता श्रद्धा से निर्धारित होती है।
ज्ञान:
जैसी श्रद्धा, वैसा जीवन।
श्रद्धा कर्म से पहले होती है।
गलत श्रद्धा सही कर्म को भी बिगाड़ देती है।
जीवन की गुणवत्ता सोच से तय होती है।
अध्याय 18: मोक्ष संन्यास योग
गीता का समापन और सार।
मुख्य निष्कर्ष:
- स्वधर्म का पालन
- ईश्वर में पूर्ण समर्पण
- अंततः अर्जुन का निर्णय
गीता का अंतिम अध्याय समस्त उपदेशों का सार प्रस्तुत करता है। श्रीकृष्ण अर्जुन को स्वधर्म पालन, पूर्ण समर्पण और आत्मविश्वास का संदेश देते हैं। अर्जुन का मोह समाप्त हो जाता है और वह युद्ध के लिए तैयार होता है। यह अध्याय निर्णय, जिम्मेदारी और आत्मबोध के साथ गीता को पूर्ण करता है।
ज्ञान:
स्वधर्म छोड़ना पतन है।
समर्पण कमजोरी नहीं, सर्वोच्च शक्ति है।
कर्तव्य करो और परिणाम ईश्वर को सौंप दो।
गीता यहीं समाप्त नहीं होती—
यहीं से जीवन सही मायने में शुरू होता है।




